महामृत्युंजय जाप अनुष्ठान
Mahamrityunjay Mantra Jap & Homa
"ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्॥" यह संजीवनी मंत्र भगवान शिव का सबसे शक्तिशाली अस्त्र है जो मृत्यु को भी टालने की क्षमता रखता है।
Mahakaleshwar Ujjain



महामृत्युंजय मंत्र की महिमा
महामृत्युंजय मंत्र को वेदों का हृदय और "संजीवनी विद्या" कहा जाता है। महर्षि दधीचि और शुक्राचार्य ने इसी मंत्र के बल पर मृत शरीर में प्राण फूंकने की सिद्धि प्राप्त की थी।
जब कोई व्यक्ति भयानक दुर्घटना का शिकार हो जाए, कोई असाध्य रोग (कैंसर, हार्ट अटैक) घेर ले, या कुंडली में मारकेश (मृत्यु का योग) आ जाए, तब केवल और केवल महामृत्युंजय मंत्र का जाप ही उस व्यक्ति को यमराज के पाश से खींचकर वापस ला सकता है। यह भगवान शिव के रौद्र और रक्षक रूप की आराधना है।
यह अनुष्ठान कब कराना चाहिए?
महामृत्युंजय अनुष्ठान विशेष परिस्थितियों में अत्यंत आवश्यक हो जाता है:
- जब परिवार का कोई सदस्य आईसीयू (ICU) या वेंटिलेटर पर मृत्यु से संघर्ष कर रहा हो।
- जब डॉक्टर किसी बीमारी का इलाज करने में हार मान चुके हों।
- जब ज्योतिष विश्लेषण में स्पष्ट रूप से मारकेश की दशा या अकाल मृत्यु का योग दिखाई दे।
- जब व्यक्ति को बार-बार भयानक दुर्घटनाओं का सामना करना पड़ रहा हो।
- शत्रुओं का भारी भय या किसी भी प्रकार का तांत्रिक (Black magic) प्रभाव महसूस हो रहा हो।
सवा लाख (1.25 Lakh) महामृत्युंजय जाप प्रक्रिया
यह एक अत्यंत विशाल और दीर्घकालिक अनुष्ठान है, जिसे 5, 7, या 11 ब्राह्मण मिलकर 7 से 11 दिनों में पूर्ण करते हैं।
चरण 1: संकल्प
यजमान (या रोगी) के नाम, गोत्र और रोग मुक्ति की कामना के साथ आचार्य विशेष संकल्प लेते हैं।
चरण 2: मंत्र जाप
प्रतिदिन ब्राह्मणों द्वारा पूर्ण शुद्धि के साथ महामृत्युंजय मंत्र का सवा लाख (1,25,000) बार सस्वर जाप किया जाता है।
चरण 3: दशांश हवन
जाप पूर्ण होने के अंतिम दिन, मंत्रों की कुल संख्या के दसवें हिस्से (दशांश) यानी 12,500 आहुतियों के साथ विशाल हवन किया जाता है। इसमें गिलोय, काले तिल और घी का प्रयोग होता है।
चरण 4: मार्जन और तर्पण
हवन के पश्चात् मंत्रों की ऊर्जा को रोगी के शरीर तक पहुँचाने के लिए कुशा और जल से मार्जन किया जाता है।
पूजन के दौरान नियम
पूजन से पहले:
- जिस रोगी या व्यक्ति के लिए जाप हो रहा है, उसके परिजनों को अनुष्ठान चलने तक पूर्ण ब्रह्मचर्य और सात्विक आहार का पालन करना चाहिए।
- रोगी को मानसिक रूप से शिव का ध्यान करना चाहिए।
पूजन के बाद:
- अनुष्ठान पूर्ण होने के बाद ब्राह्मणों को उचित दक्षिणा और भोजन कराएं।
- महामृत्युंजय यंत्र को धारण करें।
अनुष्ठान के चमत्कारिक लाभ
- मृत्यु शय्या पर पड़े रोगी को भी नवजीवन (नया जन्म) प्राप्त होता है।
- सभी प्रकार के असाध्य रोगों और शारीरिक कष्टों का चमत्कारी रूप से नाश होता है।
- जन्म कुंडली का मारकेश और अकाल मृत्यु का योग हमेशा के लिए भस्म हो जाता है।
- व्यक्ति के चारों ओर एक अभेद्य सुरक्षा कवच बन जाता है, जिसे कोई शत्रु या दुर्घटना पार नहीं कर सकती।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
क्या रोगी का उज्जैन आना आवश्यक है?
नहीं। यदि रोगी गंभीर अवस्था में अस्पताल में है, तो उसका फोटो, नाम, गोत्र और माता-पिता का नाम देकर उज्जैन में आचार्य जी द्वारा ऑनलाइन संकल्प लेकर यह अनुष्ठान शुरू किया जा सकता है। इसका पूरा फल रोगी को प्राप्त होता है।
